"पुरखों का खुला दरबार"
मां ने कहा था कि -"सोलह सराद म पुरखा होन को खुलो दरबार रहज।"
- तब अपने जैसे अल्पज्ञ को बात कम समझ आई थी।मामला अनुभूति का था।
अब न तो समझाने के लिए मां है, न वो घनी छांव से पिता।
पर उनकी बातें अवश्य है,थी,और रहेगी।
- तो
- सोलह श्राद्ध में हम पितरों के आशीर्वाद की आकांक्षा लिए गया जी धाम में पहुंचे थे,श्राद्ध कर्म के अंतिम दिवस के दौरान जब पंडा जी ने हमसे कहा कि - "अब सारे पिंडों को एक कर दीजिए।"
तब साथ में श्राद्ध कर्म कर रहे साथियों ने पंडा जी की ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा।
पंडा जी ,हमारे हाव भाव समझ गए थे।
उन्होंने कहा -अब आपके सारे पितर एक होकर मोक्ष धाम में प्रवेश करेंगे।इसलिए हमने सारे पिंडों को एक कर दिया है,यहां से सभी, एक होकर ,साथ हो गए है।
- आप अब एक हुए ,इस पिंड को हृदय से लगाएं,सम्मान से मस्तक से लगाएं।आपके पितरों से कहें, कि वे आपको अतुलनीय आशीष प्रदान करें।
हमारे लिए यह क्षण मार्मिक,हृदयस्पर्शी था।हमारी आंखे नम हो गई।
वहीं आंखे नम,अंदर से रोम रोम अपने पुरखों को गले लगाने खिल उठा था।
- यह भाव माता पिता के अंत्येष्टि कर्म के दौरान भी जागृत हुआ था,तब भी हमारे परिवार के सभी भाई एवं बड़ों ने पिंड को हृदय से लगाकर आंख नम की थी।
हम गौरवान्वित थे।
वाह !क्या धर्म संस्कृति है,जो मोक्ष के द्वार जाते - जाते एकता का भाव प्रदर्शित कर रही है।यह हमारे लिए पवित्र संदेश था।
वहीं -
इस दौरान
गौर करने वाली बात यह भी है, कि पितरों के श्राद्ध तर्पण हेतु देश के 55 स्थानों में से इस स्थान का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है,- "गयाजी"
और इतना सम्मान होना भी चाहिए।
गया जी में हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम,माता सीता जी अपने भ्राता लक्ष्मण सहित अपने पिता राजा दशरथ का पिंड दान करने पधारे थे, उस दौरान प्रभु राम एवं लक्ष्मण पिंड दान की व्यवस्था करने चले गए।
राजा दशरथ की आत्मा ने पिंड की चाह व्यक्त की,उस दौरान माता सीता ने प्रभु राम की अनुपस्थिति मे वहीं फल्गु नदी,गाय,केतकी के फूल, वट वृक्ष की साक्षी में रेत के पिंड अर्पण किए।
- यहां स्त्री द्वारा पिंडदान का महत्व प्रतिपादित होता है।जो वर्तमान में स्त्री के अधिकारों की पैरवी करता है।
प्रभु श्री राम को माता सीता ने उस दौरान घटित स्थिति के बारे में बताया।उन्होंने कहा कि पिंड दान उनके द्वारा हो चुका है,वहीं अपनी बात की पुष्टि के लिए फल्गु नदी,गाय,केतकी के फूल, वट वृक्ष को गवाही देने को कहा।लेकिन फल्गु नदी,गाय एवं केतकी मुकर गए,कहते है तब से ही गाय,केतकी,फल्गु नदी शापित हो गई।
सच कहने का पुरुष्कार वट वृक्ष को मिला जो अक्षय होने का वर प्राप्त कर पल्लवित हो रहा है।
इसी संदर्भ में यहां गयासुर का संक्षिप्त उल्लेख आवश्यक है।जिसने तप कर भगवान से यह वर ले लिया था,जो भी उसका दर्शन करेगा,उसके पाप नष्ट हो जाएंगे। उस दौरान पाप करने वालों की लग बैठी,गयासुर के दर्शन कर वे अपने पाप नष्ट कर लेते।अव्यवस्थाएं फैली तो भगवान ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र भूमि खोजने का कहा,गयासुर को स्वयं से पवित्र कुछ सूझा ही नहीं,वह यज्ञ के लिए स्वयं लेट गया।पांच कोस में उसका शरीर फैला,जिसमे गयाजी बसा है।
गयासुर ने प्रभु से कहा कि आपके आशीर्वाद से यह स्थान पितरों के निमित्त हो।
भगवान ने आशीर्वाद दिया।श्री हरि विष्णु यहां पितर के रूप में विराजमान है।
श्री हरि विष्णु के पग यहां विद्यमान है।
- कहते है पितर,पिंड दान ,तर्पण से प्रसन्न होकर अपने परिजन को आशीर्वाद देते है।
"श्रध्दायां इदम श्राद्धम।"
हमारे साथ पिंडदान कर्म के दौरान परम मित्र विशाल तिवारी थे,पिंड बनाते बनाते अपने कुशल संयोजन में वे भाव विभोर हुए,पर स्वभावगत वे छुपा गए।"ना जानामि योगम, जपम नैव पूजाम" का भाव लिए श्राद्ध कर्म कर रहे रोहित सैनी जो अपनी मां के साथ यह कर्म कर रहा था,उसे पुरखों को एक करना एवं हृदय से लगाने का भाव हृदय में घर कर गया था,वह अत्यधिक प्रभावित हुआ था।साथ में भाई अनिल नामदेव भी भाव विभोर था।
गया जी से लौटते समय सहयात्री श्री संजीव उपाध्याय सोनू भैया ने बड़ी बात कही थी,वे बोले -यार गया जी अपने बच्चो को भी दिखाना चाहिए।ताकि आने वाली पीढ़ी इस महत्व को समझ सके।
बात बड़ी थी।
सच में, मोक्ष की नगरी गयाजी में पिंड दान के दौरान पितरों के साथ होने की अनुभूति होती है।वैसे यहां साल भर पिंड दान होते है।
पर
मां कहती थी,फिर स्मरण आ गया।यहां पुरखों का दरबार है।
आप भी फल्गु नदी,विष्णुपद मंदिर,प्रेत शिला,अक्षय वट आदि स्थानों के चित्र दर्शन कीजिए।
यात्रा के दौरान जैसा सुना,अनुभव किया, सो लिखा।
*देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।*
*नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः।।*



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