मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

पुरखों का खुला दरबार"




 "पुरखों का खुला दरबार"


मां ने कहा था कि -"सोलह सराद म पुरखा होन को खुलो दरबार रहज।"

- तब अपने जैसे अल्पज्ञ को बात कम समझ आई थी।मामला अनुभूति का था।

अब न तो समझाने के लिए मां है, न वो घनी छांव से पिता।

पर उनकी बातें अवश्य है,थी,और रहेगी।

सोमवार, 22 मार्च 2021

"विशिष्ट चतुष्कोणीय जलाधारी वाले शिवलिंग को सिंदूर का लगाते हैं तिलक"

"विशिष्ट चतुष्कोणीय जलाधारी वाले शिवलिंग को सिंदूर का लगाते हैं तिलक।"
 भक्तों की आस्था का केंद्र-तिलक सिंदूर।


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रविवार, 7 फ़रवरी 2021

भगवान अपने भक्त को प्रतिदिन देते थे चांदी का कलदार

*भगवान अपने भक्त को प्रतिदिन देते थे चांदी का कलदार*
-समाज के गौरव,संत श्री दीनदास जी महाराज-
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भगवान त्रिलोकीनाथ ने अपने भक्त की सेवा चाकरी से प्रसन्न होकर प्रतिदिन की मजदूरी तय कर दी थी।गृहस्थ आश्रम में रहकर सेवा करने वाले
अपने भक्त(दीनदास जी) को प्रभु, प्रतिदिन एक चांदी का कलदार देते थे। पूजन के समय भगवान पलने में स्वयं झूलते और दर्शन देकर अपनी उपस्थिति भी देते थे। 
-हम बात कर रहे हैं हरदा जिले के सिराली ग्राम (पूर्व मकड़ाई रियासत) में स्थित गुरु दरबार, गुरुगादी की।नार्मदीय ब्राह्मण समाज के गौरव सद्गुरु समर्थ श्री दीनदास जी महाराज जन्म  संवत 1892 (पिता श्री नरोत्तम जी शुक्ल) ने अपना सम्पूर्ण जीवन गृहस्थ आश्रम में रहकर भगवत भजन,सत्संग में व्यतीत किया।उनका प्रभु से साक्षात्कार होता था।प्रभु श्रीराम के सगुण उपासक सद्गुरु दीनदास जी महाराज के गुरु श्री कृष्णानंद जी महाराज कुढ़ावा थे।कृष्णानंद जी महाराज जब अपने शिष्य दीनदास जी महाराज के पास सिराली आए तब गुरु भक्ति में लीन दीनदास जी से गुरु ने कहा कि- "दीनदास मेरा कृष्ण मुझे प्रतिदिन भेंट देता।तुम्हारा राम तुम्हे अपनी सेवा चाकरी में क्या देता है।"
 दीनदास जी महाराज ने कहा कि -गुरु सेवा के चलते अभी कुछ दिनों से मुझे प्रभु भक्ति की मजदूरी नही मिल पा रही है,आज प्रभु सेवा की मजदूरी अवश्य मिलेगी।   
भगवान द्वारा अपने भक्त को प्रतिदिन एक कलदार मिलने के रहस्य का उद्घाटन श्री कृष्णानंद जी महाराज ने उस समय देखा।कृष्णानंद जी को प्रभु के चरणों मे कलदार मिले थे।सिराली में अपने शिष्य दीनदास जी के यहां आए उन्हें तब 22 दिन हुए थे,तब प्रभु ने दीनदास जी को गुरुसेवा(कृष्णानंद जी की सेवा)के 22 दिनों के कलदार भी दिए।भगवान की अपने भक्त के प्रति चिन्ता,उनका प्रेम अतुलनीय है।श्री दीनदास जी प्रचार प्रसार से कोसो दूर रहते थे।जो उनके समीप आया,वह उनका हो गया।गुरु देव ने निमाड़ी,मालवी,मराठी आदि भाषाओं में पद लिखे है।

--श्री दीनदास महाराज को अपने देवलोक गमन का आभास हो गया था।बैकुण्ठ चतुर्दशी संवत 1956 का दिन था वह।गुरु के द्वारा देवलोकगमन की बात के बाद उनके भक्त एकत्रित होने लगे।भजन कीर्तन होने लगा।रात होने लगी।महाराज श्री के भाई ने उनसे आकर कहा कि देह त्याग के कोई लक्षण दिखाई नही दे रहे है।देखना जग हंसाई नही हो।
श्री दीनदास जी मुस्कुराए।रात्रि 12 बजे भगवान त्रिलोकीनाथ की आरती हुई।और पूज्य श्री दीनदास जी महाराज ने शरीर त्याग दिया।
भक्त का भगवान से जब साक्षात्कार होता है तब नियंता के मानस से भक्त परिचित होता है।


सद्गुरु समर्थ श्री दीनदास जी महाराज के श्री चरणों सादर प्रणाम।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

हकीकत बयां करती तस्वीर-राइट क्लिक बनाम ब्राइट क्लिक


*राइट क्लिक बनाम ब्राइट क्लिक*

"जरा सरको बाबूजी,अभी यहां दो सवारी और बैठेगी।"ड्राइवर सीट की ओर सरकने का इशारा करते हुए कंडक्टर बोला।

अब क्या हमारे माथे पर बैठाएगा? वैसे ही ठूंस -ठूंस के बैठा रहा है, हमारी मोटर साइकिल पंचर नही होती तो कौन बैठता तेरी गाड़ी में।हद से ज्यादा सवारी बैठा रखी है।कच्ची सड़को का टाइटैनिक जहाज है तेरी चौपहिया।ऑफिस ज्वाइन करने का अलग टेंशन है,जल्दी चल भाई।खीझते हुए बाबूराम ने कहा।
 "चिंता ना करो बाबूजी।" सबको बैठा के ले जाएंगे।अभी दचके में सब एडजस्ट हो जाएगी सवारी।अपने एम पी की सड़कें है सवारी को सावधान रहना सिखाती है।सवारी दचके एवं खराब सड़क के कारण पकड़ के बैठती है।सिर्फ हमारी ही गाड़ी चलती है इस सड़क पर।

सिटिंग कैपेसिटी से ज्यादा सवारी है ,तुम्हारी गाड़ी में।ऐसे लबालब सवारी बैठाते हो किसी की जान की परवाह नही है क्या? गाड़ी का बीमा करा रखा है या नही? परमिट ,फिटनेस सब क्या कागजो पर चल रहा है।कोई चेकिंग नही होती क्या? प्रशासन का डर नही है क्या? ,बाबूराम ने एक साथ कई प्रश्न दागे।

फिटनेस,परमिट,बीमा,सिटिंग केपेसिटी तो सेटिंग केपेसिटी पर निर्भर करता है बाबूजी। चेकिंग के समय सूचना मिल जाती है।वैसे भी हम सवारी को बोल देते है कि शहर के बाहर उतारेंगे।ताकि बाद में झंझट नही हो।

हाँ, देश मे समाजसेवी भरे पड़े है आप जरा गाड़ी का स्टैंड छोड़कर गाड़ी चलाओ,सभी आपको सतर्क करते है ना।वैसे ही चेकिंग के समय राहगीर होन बोल देते है -"आगे चेकिंग हो रही है।"हम संभल जाते है।कंडक्टर ने राहगीर होन में शब्द "होन" बहुवचन के लिए प्रयोग किया था।और अभी तक तो भगवान की कृपा से कोई दुर्घटना नही हुई है बाबूजी।पर आप इतनी बातें पूछ रहे हो ?आप यहां नए लग रहे हो? वर्ना सवारी तो जैसे- तैसे बैठ के शहर जाती है बेचारी।

बाबूराम ने कहा-"सही में, जनता मजबूरी की मारी है" तभी तो लटककर गन्तव्य तक पहुंच रही है ,गाड़ी में जवान लटके है,बूढ़े,बच्चे,महिला परिस्थितियों से समझौता कर मील के पत्थरों को पार कर खुशी जाहिर करते है।बाबूराम ने सोचा प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र के बारे में सोचना बेमानी है,जहां वैचारिक प्रदूषण भरा पड़ा हो।
इधर गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी।कंडक्टर और सवारी की आस लगाए आवाज लगा रहा था।
बाबूराम अपने भाई के इंतज़ार में था कि मोटर साइकिल का पंचर सुधर जाए तो ये आफत के सफर से निजात मिले।तभी उसको छोटा भाई आता दिखा।बाबूराम सवारी गाड़ी से उतर गया ।
" बस चल ही रहे है बाबूजी"कंडक्टर बोला।और सवारी गाड़ी धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी ताकि सवारी को ढांढस बंधे।
बाबूराम बोला -मुझे ऑफिस ज्वाइन करना है। तभी पास खड़े छोटे भाई से कहा -चलो जिला परिवहन विभाग, ऑफिस ज्वाइन करना है।
कंडक्टर ने कहा-अच्छा बाबूजी फिर मिलेंगे।
बाबूराम ने कहा-शीघ्र ही।
-अपना मोबाइल निकाल कर उसने सवारी से लवालब गाड़ी की फ़ोटो निकाली।
छोटा भाई बोला- बढ़िया फ़ोटो आई है भैया,एकदम "राइट क्लिक" ।
बाबूराम बोला-ईश्वर करे,जनता के लिए भी हो ,यह "ब्राइट क्लिक।"
छोटा ने चुटकी लेते हुए कहा- भैया आपके लिए है यह ब्राइट क्लिक।अब तो सरकार भी सख्त हो गई है।नया चाला आन पड़ा है।ट्रैफिक नियम का पालन नही तो चालान के लिए तैयार हो जाओ भैया।अरे! भैया फ़ोटो में देखो- जिंदगी की किल किल से परेशान साइकिल पर सवार आम आदमी मशीन से होड़ लगा रहा है,साथ मे बैठी है नन्ही कन्या,शायद बेटी हो उसकी।उसकी शक्ति भी।गरीब पिता की शक्ति।गहरी सांस लेते हुए छोटा बोला-"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः।"
बाबूराम बोला-ओ! राष्ट्रचिंतक,चल।
(प्रस्तुत चित्र-पत्रिका फेडरेशन ऑफ सोसायटी से साभार)

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

मंदिर के द्वार पर इंतज़ार में बैठी थी माँ

मंदिर के द्वार पर इंतज़ार में बैठी थी माँ
 
-बाबा केदारनाथ मंदिर के शिखर दर्शन,मंदिर के सामने स्थित नंदी दर्शन से हम उत्साहित थे।उत्तराखण्ड में हिमालय की गोद मे स्थित यह स्थल आत्मिक शांति प्रदान कर रहा था।मंदिर में प्रवेश करने की उत्सुकता थी।
-मुख्य द्वार पर माँ के साथ सपत्निक प्रवेश करने  के लिए जा रहा था,पर माँ रुक गई।
मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि तुम  दोनों जाओ।मैं यहीं द्वार पर बैठूंगी।
मुझे लगा माँ हांफ रही है, इसलिए कुछ देर आराम से बैठना चाहती है।शरीर में रक्त की कमी से यह समस्या उनको अक्सर हो जाती थी।

माँ ने कहा-"तुम लोग दर्शन कर लो,मैं बाद में करूंगी।"

माताजी के बगैर,हम भी दर्शन कैसे कर लेते।
प्रदक्षिणा पथ पर हम लोग मंदिर को निहारने लगे।प्राप्त जानकारी अनुसार हम पांडव वंश द्वारा निर्मित,आदि शंकराचार्य द्वारा जीर्णोद्धार किए कत्यूरी शैली में बने मंदिर का सौंदर्य देख चकित थे।मैं ,स्वयं को बाबा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर, प्राप्त प्रभु कृपा से अभिभूत था।चारधाम दर्शन की योजना के दौरान मेरा ऑपरेशन हुआ था।माँ को एमडीएस बीमारी के चलते खून की कमी रहने लगी थी।इस कारण हर माह दो तीन  बॉटल खून चढ़ाना आवश्यक होता था।मेरे ऑपरेशन के 20 दिन बाद,माँ की तबियत के चलते प्रभु दर्शन कल्पना से परे था।
माँ की इच्छा थी,उनके आशीर्वाद से उनके साथ प्रभु के सामने पहुंचे थे।
यात्रा के दौरान लैंड स्लाइडिंग के कारण रास्ते बंद थे।इसलिए हम यहाँ हैलीकाप्टर से पहुंचे थे।हमारे साथ यात्रा में श्री माधव जी पारे,श्री अशोक जी पाराशर,श्री नरेश जी पगारे,श्री संदेश जी पारे सहित 16 सदस्य थे।सबसे पहली ट्रिप में माँ के साथ मैं और पत्नी यहाँ पधारे थे,शेष अन्य ट्रिप में आने वाले थे।बेटा अर्पण एवं अणिमा हमारे बाद कि उड़ान में शामिल थे।
हम अपने सभी साथियों की राह देख रहे।
इधर माँ ,केदारनाथ मंदिर के द्वार पर भजन में लीन थी,बीच बीच मुझसे बेटे बेटी सहित अन्य लोग के यहाँ आने की पूछ लेती थी।
मेरी चिंता माँ के स्वास्थ्य को लेकर थी।माताजी का मंदिर में प्रवेश नही कर, द्वार पर ही रुकना।मेरी समझ से परे था।

केदारनाथ में हुई त्रासदी के बाद यह दूसरा साल था,प्रशासन व्यवस्था में जुटा था,लेकिन मौसम के अनुसार कार्य होता था।उस दिन भी फॉग का अंदेशा था,हम शीघ्र दर्शन कर वापस जाना चाह रहे थे।हैलीकाप्टर द्वारा सभी साथियों के आने का इंतज़ार था।
 इधर माँ मंदिर के द्वार पर ही बैठी थी,चिंतावश में उनसे पूछता तो वो कहती-" मैं दर्शन कर लूंगी।"
जाने किस विचार में थी माँ!

समय के बीतते-दूसरी ट्रिप,तीसरी,चौथी ट्रिप में हैलीकॉप्टर से आए साथी हमारे साथ शामिल हो गए थे। उड़ान में बच्चों के शामिल होकर, यहां पहुंचने की राह हम देख रहे थे। हैलीकाप्टर में वजन अनुसार यात्रियों को बाबा के धाम लाया जा रहा था।
बीती रात से बेटा अस्वस्थ था,उसका बेसब्री से इंतज़ार था।
हैलीकॉप्टर से पांचवी ट्रिप मे बिटिया केदारनाथ धाम पहुंची।बेटी को देखकर माँ के चेहरे पर रौनक आ गई थी।
माताजी ने बेटी को करीब बैठा लिया।


-लगभग 2 घण्टे बाद छठवीं उड़ान में श्री अशोक जी पाराशर के स्नेहाशीष में बेटा अर्पण केदारनाथ धाम पहुंचा।
 
अब हम सभी साथी एकत्रित हो गए थे।

इधर माताजी के करीब बिटिया एवं बेटा पहुंच चुके थे।
अर्पण ने दादी को प्रणाम कर कहा-"चलो दादी  दर्शन करते है।"
 माँ में गजब की स्फूर्ति आ गई थी।
यह शक्ति, बीमार अवस्था मे उन्हें चढ़ाए जाने वाले रक्त से कही बेहतर थी।
माँ ने बेटे की तबियत का हालचाल लेकर कहा-मैं तुम दोनों के साथ दर्शन की इच्छा लिए  भगवान का जाप कर रही थी।तुम दोनों के साथ दर्शन करूंगी,देवो के देव महादेव के।

दादी के दोनों हाथ पकड़कर अर्पण एवं अणिमा ने उठाया।
माँ ने कहा -पोते पोती के साथ प्रभु दर्शन सौभाग्य की बात है,सब आपकी कृपा है भोलेनाथ।

और बेटी -बेटे के साथ माँ मंदिर में प्रवेश कर रही थी।

-माताजी प्रसन्न अवस्था मे बार बार प्रभु के प्रति अपने भाव व्यक्त कर आंख नम कर लेती थी।
अपने पोते पोती के साथ दर्शन की उनकी भावना को मैं प्रणाम कर रहा था।पोते -पोती के साथ माँ के प्रवेश की वह छवि आज भी हृदय में विद्यमान है।
  माताजी का यह अतुलनीय स्नेह,मेरे मानस में अंकित है।
हमारे माता पिता के साथ व्यतीत समय की यादें, उनके संस्कार,पग-पग पर हमें सिखाते हैं।
हमारी सभ्यता,संस्कार के रक्षक हमारे बुजुर्ग।

अब तो यादें शेष है।

आज 19 जनवरी 2021 को माताजी की पंचम पुण्यतिथि है।
 ।।सादर प्रणाम माँ।।

पुरखों का खुला दरबार"

 "पुरखों का खुला दरबार" मां ने कहा था कि -"सोलह सराद म पुरखा होन को खुलो दरबार रहज।" - तब अपने जैसे अल्पज्ञ को बात कम सम...