*भगवान अपने भक्त को प्रतिदिन देते थे चांदी का कलदार*
-समाज के गौरव,संत श्री दीनदास जी महाराज-
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भगवान त्रिलोकीनाथ ने अपने भक्त की सेवा चाकरी से प्रसन्न होकर प्रतिदिन की मजदूरी तय कर दी थी।गृहस्थ आश्रम में रहकर सेवा करने वाले
अपने भक्त(दीनदास जी) को प्रभु, प्रतिदिन एक चांदी का कलदार देते थे। पूजन के समय भगवान पलने में स्वयं झूलते और दर्शन देकर अपनी उपस्थिति भी देते थे।
-हम बात कर रहे हैं हरदा जिले के सिराली ग्राम (पूर्व मकड़ाई रियासत) में स्थित गुरु दरबार, गुरुगादी की।नार्मदीय ब्राह्मण समाज के गौरव सद्गुरु समर्थ श्री दीनदास जी महाराज जन्म संवत 1892 (पिता श्री नरोत्तम जी शुक्ल) ने अपना सम्पूर्ण जीवन गृहस्थ आश्रम में रहकर भगवत भजन,सत्संग में व्यतीत किया।उनका प्रभु से साक्षात्कार होता था।प्रभु श्रीराम के सगुण उपासक सद्गुरु दीनदास जी महाराज के गुरु श्री कृष्णानंद जी महाराज कुढ़ावा थे।कृष्णानंद जी महाराज जब अपने शिष्य दीनदास जी महाराज के पास सिराली आए तब गुरु भक्ति में लीन दीनदास जी से गुरु ने कहा कि- "दीनदास मेरा कृष्ण मुझे प्रतिदिन भेंट देता।तुम्हारा राम तुम्हे अपनी सेवा चाकरी में क्या देता है।"
दीनदास जी महाराज ने कहा कि -गुरु सेवा के चलते अभी कुछ दिनों से मुझे प्रभु भक्ति की मजदूरी नही मिल पा रही है,आज प्रभु सेवा की मजदूरी अवश्य मिलेगी।
भगवान द्वारा अपने भक्त को प्रतिदिन एक कलदार मिलने के रहस्य का उद्घाटन श्री कृष्णानंद जी महाराज ने उस समय देखा।कृष्णानंद जी को प्रभु के चरणों मे कलदार मिले थे।सिराली में अपने शिष्य दीनदास जी के यहां आए उन्हें तब 22 दिन हुए थे,तब प्रभु ने दीनदास जी को गुरुसेवा(कृष्णानंद जी की सेवा)के 22 दिनों के कलदार भी दिए।भगवान की अपने भक्त के प्रति चिन्ता,उनका प्रेम अतुलनीय है।श्री दीनदास जी प्रचार प्रसार से कोसो दूर रहते थे।जो उनके समीप आया,वह उनका हो गया।गुरु देव ने निमाड़ी,मालवी,मराठी आदि भाषाओं में पद लिखे है।
--श्री दीनदास महाराज को अपने देवलोक गमन का आभास हो गया था।बैकुण्ठ चतुर्दशी संवत 1956 का दिन था वह।गुरु के द्वारा देवलोकगमन की बात के बाद उनके भक्त एकत्रित होने लगे।भजन कीर्तन होने लगा।रात होने लगी।महाराज श्री के भाई ने उनसे आकर कहा कि देह त्याग के कोई लक्षण दिखाई नही दे रहे है।देखना जग हंसाई नही हो।
श्री दीनदास जी मुस्कुराए।रात्रि 12 बजे भगवान त्रिलोकीनाथ की आरती हुई।और पूज्य श्री दीनदास जी महाराज ने शरीर त्याग दिया।
भक्त का भगवान से जब साक्षात्कार होता है तब नियंता के मानस से भक्त परिचित होता है।
सद्गुरु समर्थ श्री दीनदास जी महाराज के श्री चरणों सादर प्रणाम।
जय दीनदास जय महाराज।सादर प्रणाम।
जवाब देंहटाएंहरदा जिले के सिराली मे दीनदास जी महाराज की चरण पादुका दर्शन हेतु उपलब्ध है महाराज जी का आशीर्वाद सभी पर बना रहे। जानकारी के लिए धन्यवाद।
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