"विशिष्ट चतुष्कोणीय जलाधारी वाले शिवलिंग को सिंदूर का लगाते हैं तिलक।"
भक्तों की आस्था का केंद्र-तिलक सिंदूर।
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"यहीं से तो पचमढ़ी गए थे,हमारे बाबा।"
-मेरे अगले प्रश्न को अनसुना कर उसने स्थान की महिमा बताते हुए कहा-
"सिंदूर का तिलक लगता है भोलेनाथ को।यहाँ भोले बाबा को सिंदूर चढ़ता है।इसलिए ही कहते हैं तिलक सिंदूर।"
-पवित्र स्थल "तिलक सिंदूर"से लगाव के वशीभूत,गौरवान्वित होकर एक सांस में ,फूल विक्रेता 55 वर्षीय आदिवासी ने मुझे बताया।
-मुझे स्थान की जानकारी की जिज्ञासा थी,मैंने कहा-और क्या-क्या जानते हो?
उसने कहा-"हमारा तो सब कुछ यही है।"
भोले आदिवासी का बड़ा उत्तर मेरे कानों में गूंज गया था,यही सत्य था।
-उसके भक्ति-भाव को मैं प्रणाम कर सतपुड़ा की सुरम्य वादियों में बसे "तिलक सिंदूर" को निहारकर अभिभूत था।
-इटारसी से लगभग 17-18 किमी दूर बाबा भोलेनाथ यहाँ पहाड़ी में स्थित गुफा में विराजमान हैं।ग्राम जमानी से यह लगभग 6 किमी दूर है।बताते हैं कि भस्मासुर से लीला करते हुए भोलेनाथ इस गुफा में छुप गए थे,यहीं से गुफा(सुरंग) मार्ग से बाबा पचमढ़ी गए थे।यहां स्थित शिवलिंग की जलाधारी चतुष्कोणीय है, वहीं जलाधारी से जल पश्चिम की ओर प्रवाह होता है।विशेषकर शिवलिंग की जलाधारी के जल का प्रवाह उत्तर की ओर होता है।प्राप्त जानकारी के अनुसार अपने तरह से विशिष्ठ यह शिवलिंग ओम्कारेश्वर के समकालीन बताया गया है।
पहाड़ी में गुफा में स्थित भोलेनाथ के मंदिर से लगा पार्वती महल भी स्थित है।शिवालय के सामने नदी के दूसरी ओर श्मशान भी है।
- शिवालय में दर्शन के लिए लाखो श्रद्धालु यहां आते हैं।
"भक्तों को कभी शिवजी ने निराश ना किया।
मांगा,जिन्हें भी चाहा, वरदान दे दिया।
बड़ा है तेरा दायजा, बड़ा दातार तू।
कैलाश के निवासी नमो बार बार हूं।
आयो शरण तिहारी, शंभु तार तार तू।"
आप भी दर्शन लाभ लीजिये।
जय जय जय
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